उत्तर-दक्षिण की खाई और लोकतंत्र का भविष्य: जनसंख्या का राजनीतिक खेल लेखक: हरिशंकर पाराशर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

उत्तर-दक्षिण की खाई और लोकतंत्र का भविष्य: जनसंख्या का राजनीतिक खेल लेखक: हरिशंकर पाराशर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

उत्तर-दक्षिण की खाई और लोकतंत्र का भविष्य: जनसंख्या का राजनीतिक खेल लेखक: हरिशंकर पाराशर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

 मध्य प्रदेश समाचार न्यूज़,नई दिल्ली, 20 जून 2026। भारतीय राजनीति इन दिनों एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) विपक्षी दलों में दरार डालकर, सांसदों के दलबदल को प्रोत्साहित करके और रणनीतिक गठजोड़ के माध्यम से अपनी संसदीय ताकत को मजबूत कर रहा है। यह प्रक्रिया न केवल लोकसभा में विधायी एजेंडे को आसान बना रही है, बल्कि 2026 के परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण बिल जैसे ऐतिहासिक बदलावों के लिए मंच तैयार कर रही है। लेकिन इस संख्या-बल की होड़ में उत्तर और दक्षिण भारत के बीच गहरी खाई उभर रही है, जो संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।

 विपक्षी सांसदों का पाला बदलना: सत्ता की रणनीति

हाल के महीनों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), शिवसेना (यूबीटी), आम आदमी पार्टी (आप) और अन्य विपक्षी दलों से बड़े पैमाने पर विद्रोह और दलबदल देखने को मिला है। कम से कम 20 टीएमसी सांसदों के एनडीए की ओर झुकाव, आप के सात सांसदों का भाजपा में विलय और महाराष्ट्र में "ऑपरेशन टाइगर" जैसी कवायदें एनडीए को लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत (लगभग 362-363 सीटें) के करीब ला रही हैं।सरकार इस ताकत का उपयोग विकास, सुशासन और संवैधानिक सुधारों के लिए कर रही है। जनता का मिजाज, खासकर हिंदुस्तान के हिंदी पट्टी में, फिलहाल स्थिरता, विकास कार्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा के पक्ष में दिखता है। लेकिन विपक्ष इसे "संस्थागत दबाव" और "घोड़ा-बाजारी" करार दे रहा है। सवाल यह है कि क्या यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया है या सत्ता के दीर्घकालिक वर्चस्व की रणनीति?

### परिसीमन 2026: उत्तर की जीत, दक्षिण की चिंता

सबसे गंभीर मुद्दा **जनसंख्या आधारित राजनीतिक पुनर्वितरण** है। 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का फ्रीज 2026 में समाप्त होने जा रहा है। 2011 की जनगणना के आधार पर प्रस्तावित परिसीमन से लोकसभा सीटों में वृद्धि (संभावित 800-850 तक) हो सकती है, जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों को 40 से ज्यादा अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं, जबकि तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र जैसे दक्षिणी राज्यों की सापेक्ष हिस्सेदारी घट सकती है।दक्षिण के राज्य परिवार नियोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य में बेहतर प्रदर्शन के कारण जनसंख्या वृद्धि दर को नियंत्रित रखने में सफल रहे। अब उन्हें "सजा" मिल रही है—कम संसदीय प्रतिनिधित्व, कम संसाधन आवंटन और घटता राजनीतिक प्रभाव। सरकार का तर्क है कि यह "एक व्यक्ति, एक वोट" का लोकतांत्रिक सिद्धांत है। लेकिन दक्षिण के मुख्यमंत्री, खासकर एमके स्टालिन, इसे संघीय भावना पर हमला बता रहे हैं।अप्रैल 2026 में पेश किए गए परिसीमन बिल और संबंधित संविधान संशोधनों को दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण रोका गया, लेकिन एनडीए की बढ़ती ताकत से इन्हें दोबारा लाने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

### महिला आरक्षण और संघीय संतुलन

महिला आरक्षण बिल (2023) को परिसीमन से जोड़कर लागू करने की योजना है। सरकार दावा करती है कि इससे कोई राज्य नुकसान में नहीं रहेगा और नारी शक्ति मजबूत होगी। लेकिन आलोचक चेताते हैं कि बिना स्पष्ट गारंटी के यह उत्तर की संख्या बढ़ाकर दक्षिण को हाशिए पर धकेल देगा। दक्षिणी राज्य विशेष वित्तीय पैकेज, संसाधन आवंटन में सुधार और सहकारी संघवाद की मांग कर रहे हैं।जनसंख्या घनत्व के लिहाज से उत्तर भारत के सांसदों और विधायकों का वजन कई गुना बढ़ जाएगा, जबकि दक्षिण पीछे छूट जाएगा। इससे आर्थिक रूप से मजबूत दक्षिणी राज्यों का योगदान घट सकता है और क्षेत्रीय असमानता बढ़ेगी।

 देश का मिजाज और सांसदों की जिम्मेदारी

वर्तमान में सत्ता का वजन उत्तर की जनसंख्या शक्ति पर टिका दिखता है। लेकिन अगर दक्षिण के अधिकारों का हनन हुआ तो क्षेत्रीय असंतोष न केवल चुनावी समीकरण बदलेगा, बल्कि राष्ट्रीय एकता को भी चुनौती दे सकता है।जो सांसद व्यक्तिगत लाभ, दबाव या अल्पदृष्टि के कारण इन बदलावों का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें इतिहास और जनता जवाबदेह ठहराएगी। संख्या बल लोकतंत्र में जरूरी है, लेकिन संवैधानिक संतुलन और संघीय भावना से समझौता खतरनाक होगा। दक्षिण के लोग राजनीतिक नेतृत्व में अपनी भरपाई कैसे करेंगे—यह आने वाला समय तय करेगा।भविष्य की संभावनाएं: एकता या विभाजन?2026 के परिसीमन और 2029 के चुनावों से पहले अगर सरकार "सभी राज्यों का समान ध्यान, कोई भेदभाव नहीं" का वादा निभाती है—वित्त आयोग, विशेष पैकेज और संवाद के जरिए—तो भारत मजबूत बनेगा। अन्यथा, उत्तर-दक्षिण खाई गहरी होकर क्षेत्रीय दलों को मजबूत करेगी और राष्ट्रीय राजनीति को ध्रुवीकृत कर देगी।भारत की ताकत उसकी विविधता और संघीय ढांचे में है। जनसंख्या न्याय जरूरी है, लेकिन विकासशील राज्यों को दंडित करने वाली नीति राष्ट्र के समग्र विकास को प्रभावित करेगी। सत्ता को दीर्घकालिक सोच अपनानी होगी, न कि सिर्फ अगले चुनाव तक। विपक्ष को भी अपनी कमियों पर गौर करना चाहिए यह बदलता राजनीतिक घटनाक्रम मात्र सीटों की गणित नहीं, बल्कि भारतीय संघ की भावना का परीक्षण है। जनता अंतिम फैसला करेगी—क्या हम एक समावेशी, संतुलित लोकतंत्र बनेंगे या क्षेत्रीय विभाजन की ओर बढ़ेंगे? समय कम है और दांव बहुत बड़ा।हरिशंकर पाराशर: 35 वर्षों के अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक। विभिन्न राष्ट्रीय समाचार पत्रों में स्तंभ लेखन।

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