'गांव पांच सौ बसै पचेल , बीचों बीच जिखे परसेल कटनी जबलपुर जिले के कुछ ग्रामीण अंचलों की बोली पचेली पर एक काव्य संकलन और प्रकाशित

 'गांव पांच सौ बसै पचेल , बीचों बीच जिखे परसेल कटनी जबलपुर जिले के कुछ ग्रामीण अंचलों की बोली पचेली पर एक काव्य संकलन और प्रकाशित

'गांव पांच सौ बसै पचेल , बीचों बीच जिखे परसेल कटनी जबलपुर जिले के कुछ ग्रामीण अंचलों की बोली पचेली पर एक काव्य संकलन और प्रकाशित

 मध्य प्रदेश समाचार न्यूज़कटनी/ जिला बघेलखंड , बुंदेलखंड  एवं गोंडवाना के त्रिकोण से घिरे क्षेत्र में स्थित है । अतः यहां के ग्रामीण अंचलों में तीनों क्षेत्र की संस्कृति , रीति रिवाज एवं परंपराओं का मिश्रण पाया जाता है । इतना ही नहीं उक्त तीनों क्षेत्र की बोलियों सहित खड़ी हिंदी एवं उर्दू से मिश्रित एक नई बोली भी यहां उभरती है , जो जबलपुर एवं कटनी जिले के अनेक ग्रामीण अंचलों में प्रचलित है।  पांच बोलियों के मिश्रण से बनने के कारण इसे भाषा विज्ञानियों द्वारा पचेली बोली कि संज्ञा दी गई है।  सदियों से बोलचाल में प्रचलित होने के बाद भी इस बोली का पुस्तकाकार रूप में साहित्य उपलब्ध नहीं होता । पचेली क्षेत्र के साहित्यकार एवं वर्तमान में जबलपुर निवासी डा. श्री कौशल दुबे एवं उनके मित्र मंडल सहित जबलपुर के ही साहित्य - संस्कृति सेवी श्री शरद अग्रवाल के प्रयासों से पचेली बोली के लेखन एवं उन्नयन हेतु एक दशक से निरंतर प्रयास किए जाते रहे हैं । जिनके द्वारा वर्ष 2017 में ' पचेली साहित्य एवं संस्कृति ' नामक एक छोटी किंतु महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रकाशन जबलपुर से कराया गया था । जिसने जबलपुर , सिहोरा , ढीमरखेड़ा , पान उमरिया जैसे अंचल के रचनाकारों को पचेली बोली में लेखन के लिए उत्प्रेरित किया एवं उल्लेखनीय संख्या में लोग इस बोली में लिखने को प्रेरित हुए । इसी श्रृंखला में डा. श्री कौशल दुबे द्वारा तैयार एवं संपादित पचेली बोली के एक काव्य संकलन को विरासत संरक्षण की दिशा में कार्य करने वाली संस्था इन्टैक , कटनी चेप्टर द्वारा वर्ष 2924 में प्रकाशित किया गया था । तत्पश्चात विगत महीनों जबलपुर से डा. कौशल दुबे की पचेली कविताओं का एक संकलन और प्रकाशित किया गया है। इसी क्रम में सतना से शब्द शिल्पी प्रकाशन के श्री अनिल अयान द्वारा श्री विजय बागरी ' विजय ' के संपादन तथा श्री मदन पेंटर के सह संपादन में पचेली कविताओं का एक ऑनलाइन संकलन विगत दिनों प्रकाशित किया गया है । जिसमें 29 रचनाकारों की सुंदर एवं सामयिक कविताएं समाहित हैं । इस ऑनलाइन संकलन को पुस्तकाकार रूप में इन्टैक , कटनी चेप्टर द्वारा भी कराया जा रहा है । इसके साथ ही श्री अखिलेश खरे ' अखिल ' द्वारा रचित पचेली नवगीतों का एक संकलन भी प्रकाशनाधीन है । एक अन्य पचेली गद्य संकलन भी प्रकाशन को तैयार है । जबकि डा. श्री सुरेंद्र सिंह बागरी के संयोजन में पचेली  शब्दकोश तैयार करने का कार्य भी प्रगति पर है । जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि पचेली साहित्य धीरे धीरे पुस्तकाकार रूप में सामने आ रहा है । जो हर्ष का विषय है । प्रस्तुत कृति  ' पचेली काव्य वीथिका ' में समाहित कुछ रचनाओं की झलक यहां प्रस्तुत हैं जिसमें समसामयिक आधुनिकता बोध भी दृष्टव्य है तो परंपराओं की नैसर्गिक महक भी हमे आह्लादित और आनंदित करती है भारत के भौगोलिक केंद्र मनोहर ग्राम - करौंदी ( पान उमरिया  ) की परिधि वाला लगभग 250 वर्ग कि. मी. क्षेत्र पचेली बोली बानी वाला पचेल अंचल कहलाता है । इस अंचल में एक कहावत भी प्रचलित है -  ' गांव पांच सौ बसे पचेल , बीचों बीच जिखे परसेल ।  'अपनी रचना में श्री प्रमोद दाहिया ने इस पचेल का गुणगान करते हुए यहां के लोक जीवन का बड़ा मोहक चित्र खींचा है  - बब्बू - बैया मिलके गाबा , गाथा या पचमेल की ।मध्यप्रदेश मा नीक लागै , बातें करी पचेल की । जय पचेली जय पचेल , जय पचेली जय पचेल ...सूध साध रहऊ थीं मनखे , मिल तिउहार मनाऊ थीं ।इक दूसर से भेद नहीं कछु , सुख दुख मा सब जाऊ थीं ।।फाग दिवारी राही भगतें , मिलजुल कर सब गाऊ थीं ।महुआ मलगा बाँस नकड़ियाँ , जंगल से लै आऊ थीं ।।भटबा खोद बना लए खितबा , याद न बंगरा डेल की ।मध्यप्रदेश मा नीक लागै , बातें करी पचेल की ...वरिष्ठ कवि उदयभानु तिवारी ' मधुकर ' के गीत में ग्राम्य जीवन में कृषि कर्म से जुड़े लोगों की व्यथा को बड़े मार्मिक ढंग से रेखांकित किया गया है - बबुआ कस कस होय किसानी ।आँख मिचौनी बिजली खेले ,मिलै   तनक  सो  पानी ।बबुआ कस कस होय किसानी।भर बोरिन में धान किसानी ,मण्डी खें जब जामें ।भीड़ जुरा थी बहुतै हम तो ,खड़े खड़े थक जामें ।कभूं कभूं तो लगे ढेर मेंगिरैं लगा थै पानी ।बबुआ कस कस होय किसानी ...नवगीत की वरिष्ठ कवयित्री अरुणा दुबे की रचना लपाड़ुओं पर मोहक तंज करती है तो इसमें लोकोक्तियों का रस भी मिलता है - जी के घर में ढोर न बाछी उन्हीं  नींदें  आमे  आछी  दूसर खें दें ज्ञान पेल खें हाँके हँके न खुद की माछी खुदै खबर नईं काल परों कीआने की तकदीरें बाँचीं .. घर घर में तथाकथित महिला सशक्तिकरण की दशा पर परिहास करते हुए सुरेश ' विचित्र ' कहते हैं -बाबू साहब होत भुंनसरे बहरा लय घर खां झारत हीं ।अऊ, मिहरियाँ परी परीमोबाइल मां बतयाउत हीं ।। ग्रीष्म ऋतु का बड़ा मोहक और रोचक मानवीयकरण करते हुए अखिलेश खरे  ' अखिल '  कहते हैं - ब्याह खर्च पर गिने रुपैया पीपर पतझर पत्ता कस राहगीर के साथ हाथ में पानी बॉटल देख उमसहवलदार कस पाय प्रमोशन

दुपहर थानेदार भई ...

पचेली बोली आंदोलन के सूत्रधार डा. कौशल दुबे की रचना में पचेल अंचल के संस्कारों की बड़ी मोहक महक मिलती है । अपने संदेश में आप कहते हैं -ऊँच नीच सब खैं बिचार के पाँव अगारु धरनैं ।फसल प्रेम की लहलहाय बब्बू या कोशिश करनैं ।नींव कुटुम्ब हमारी है या मजबूती दै देनैं मूँड़ परे का बुझवा आपस में साँझो कर लेनैं सूझ - बूझ से मनमुटाव खैं चौंरन घाईं छरनैं फसल प्रेम की लहलहाय बब्बू या कोशिश करनैं...मानवीय शोषण एवं सामाजिक विषमता के दृश्यों को श्री विजय बागरी ' विजय '  अपनी सजल में बिंदास ढंग से उकेरते हैं -जाँगर प्यारैं रोज टहलुआ राम दुहाईमजा उड़ामैं लगुआ भगुआ राम दुहाई,रोजै नाचै ड्योढ़ी में रंगीन पुतरिया 

धन्नासेठन के घर बबुआ राम दुहाई

औलट हुईके मिन्त बुराई करैं पेट भरपरे सामने चूमैं तरुआ राम दुहाई ... समय के साथ आए बदलाव को रचनाकार पहचानता है। इस पर चौ. द्वारका प्रसाद  ' अविरल साथी '  कहते हैं -पहलू अइसन ना रहो , जैसन दीखत आज ।परगति ता बाढ़त भई , अम्बर जइसन राज ।।फ़सलन खे गाहन लगे , गल्ला भर भर ड्राम ।मजदूरन की जघा में , करैं मशीनें काम ।।सोनउ मंहगो हो गओ, चांदी गई अग्गास।ब्याहे मा पहिनैं गिलट , जेबर केखे पास ।। वरिष्ठ साहित्यकार एवं बघेली बोली के शिखर पुरुष पद्मश्री बाबूलाल दाहिया प्रस्तुत संकलन हेतु अपने शुभकामना संदेश में कहते हैं  ' पचेली में भले ही बघेली , बुंदेली , गोंडी , फारसी और संस्कृतनिष्ठ हिंदी का सम्मिश्रण हो  पर भारत के सेंटर प्वाइंट की बोली होने के नाते उसका अपना अलग ही महत्व है बोलियों का छोटी - बड़ी  , आंचलिक बोली , उपबोली , बोली , विभाषा नाम तो विद्वान मनीषी ही रखते हैं । पर जन समुदाय बोलियों को अपनी भाषा ही मानता है , जिसमे बोलता बतियाता , सोचता और स्वप्न देखता है । इसलिए बोलियां जन सामान्य के लिए लोक व्यवहार की सम्पूर्ण भाषा होती है । और उनमें जरूरत भर को पर्याप्त शब्द भी होते हैं । इतना ही नहीं आवश्यकता पड़ने पर किसी वस्तु के गुण धर्मों के अनुसार वह नए शब्द गढ़ भी लेता है l कहना न होगा कि पvचेली में जहां भरपूर लालित्य और माधुर्य है वहीं उपरोक्त सारे गुण भी मौजूद हैं । उसमें उत्तरोत्तर और लेखन हो एवं निकट भविष्य में वह मध्यप्रदेश की पांचवीं बोली का दर्जा प्राप्त करे  । यही मेरी हार्दिक शुभकामना है । '



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