हाथी के दांत: वादों की चाशनी और अपीलों की कड़वाहट में उलझा मध्य प्रदेश का पदोन्नति का खेल
मध्य प्रदेश समाचार न्यूज़ कटनी /मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों का भाग्य भी गजब की विडंबनाओं से गुजर रहा है। पिछले 10 वर्षों से प्रदेश के सियासी मंचों से एक ही मधुर राग सुनाई दे रहा है— "हम कर्मचारियों के साथ हैं, हम उन्हें शीघ्र पदोन्नति दिलाने के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।" यह वाक्य सुनने में इतना सुखद है कि कर्मचारी हर बार भावुक हो जाता है। लेकिन जैसे ही कोई जागरूक कर्मचारी इस 'प्रतिबद्धता' का सच जानने के लिए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (High Court) के रिकॉर्ड और सरकारी फाइलों के पन्ने पलटता है, तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक जाती है। मंच की 'मनसा' और लॉ डिपार्टमेंट की 'मंशा' के बीच का फासला देखकर समझ आता है कि यहाँ चल क्या रहा है।सच्चाई यह है कि कथनी और करनी के इस मोर्चे पर सरकार खुद एक बहुत बड़े कानूनी विरोधाभास के जाल में खड़ी दिखाई दे रही है।29 रिट अपीलों का चक्रव्यूह: जब रक्षक ही बन जाए 'अपीलकर्ता'सवाल बहुत सीधा और तीखा है—अगर सरकार वाकई कर्मचारियों को प्रमोशन देना चाहती है, तो वह माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों के खिलाफ ढाल बनकर क्यों खड़ी है? मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अलग-अलग याचिकाओं के माध्यम से प्रदेश के दो दर्जन से अधिक विभागों में कर्मचारियों को पदोन्नति देने के स्पष्ट और न्यायसंगत आदेश पारित किए थे। एक सहृदय और संवेदनशील सरकार को क्या करना चाहिए था? उसे तत्काल उन आदेशों का स्वागत करते हुए संबंधित विभागों में प्रमोशन की लिस्ट जारी करनी चाहिए थी और उसी को आधार बनाकर बाकी विभागों के लिए भी रास्ता साफ कर देना चाहिए था।लेकिन यहाँ तो कहानी ही उलट गई! सरकार इन आदेशों का पालन करने के बजाय, अपने वकीलों की फौज लेकर हाई कोर्ट में ही 29 रिट अपीलें (Writ Appeals) दायर करके बैठ गई। यानी जिन आदेशों से कर्मचारियों के घर में खुशियां आ सकती थीं, सरकार खुद उन आदेशों के विरुद्ध खड़ी हो गई। अब इसे कर्मचारियों के प्रति 'सहानुभूति' समझा जाए या सिर्फ समय काटने का एक प्रशासनिक ढोंग?
कुछ के लिए 'एक्स्प्रेस-वे', बाकियों के लिए 'नियमों का नया झुनझुना'
प्रदेश की इस न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र में एक और दिलचस्प और हैरान करने वाला नजारा देखने को मिलता है। एक ही प्रदेश में, एक ही नियम के तहत, दो अलग-अलग व्यवस्थाएं समानांतर चल रही हैं। लॉ डिपार्टमेंट (विधि विभाग) और नगरीय प्रशासन विभाग जैसे दर्जन भर रसूखदार महकमे ऐसे हैं, जहाँ कुछ भाग्यशाली अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपने 'इंडिविजुअल' (व्यक्तिगत) अदालती आदेश हासिल किए और आज वे शान से पदोन्नति पाकर ऊंचे पदों पर कुर्सियां तोड़ रहे हैं।यदि सरकार की नीयत साफ होती, तो इन व्यक्तिगत आदेशों को नजीर (Precedent) मानते हुए सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) एक ही झटके में इसे पूरे प्रदेश के सभी विभागों पर लागू कर सकता था। इसके लिए किसी 'मध्य प्रदेश लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2025' के नए और पेचीदा चक्रव्यूह को रचने की कोई तात्कालिक आवश्यकता ही नहीं थी। सरकार चाहती तो पुराने या अंतरिम आदेशों के आधार पर तत्काल प्रमोशन देकर, बाद में नियमों को रिवाइज (संशोधित) कर सकती थी। लेकिन जो काम सीधे हाथ से हो सकता था, उसे जानबूझकर प्रशासनिक भूलभुलैया में धकेल दिया गया।
एफिडेविट की सियासत और छलावे की राजनीति
अब गलियारों से ताजा तथ्य छनकर आ रहे हैं कि सरकार हाई कोर्ट से अपना पुराना एफिडेविट (शपथ पत्र) वापस लेगी और कोई 'नया रास्ता' निकालेगी। बरसों से तारीखें भुगत रहे कर्मचारियों के लिए यह घोषणा किसी नए छलावे से कम प्रतीत नहीं होती। अगर सरकार के मन में रत्ती भर भी खोट नहीं है, तो उसे सबसे पहला और बुनियादी काम यह करना चाहिए कि वह हाई कोर्ट में लंबित अपनी उन सभी 29 रिट अपीलों को तत्काल प्रभाव से वापस (Withdraw) ले। जिन विभागों में कोर्ट के आदेश हो चुके हैं, उनमें बिना किसी हीलाहवाली के तत्काल प्रमोशन के आदेश जारी करे।जब तक सरकार कोर्ट से अपनी इन अपीलों को वापस नहीं खींचती, तब तक 'रास्ता निकालने' और 'कर्मचारी हितैषी' होने के तमाम दावे सिर्फ और सिर्फ खोखली लफ्फाजी और दिखावे का ढोंग ही नजर आएंगे।कर्मचारियों का मौन प्रश्न: "हुजूर, जब कोर्ट कर्मचारियों के हक में फैसला देता है, तो आप अपील में चले जाते हैं। जब कर्मचारी सड़क पर आता है, तो आप नए नियमों का लॉलीपॉप थमा देते हैं। आख़िर कब तक मध्य प्रदेश का कर्मचारी इस प्रशासनिक ढोंग की बलि चढ़ता रहेगा? हमें आश्वासनों की मीठी चाशनी नहीं, बल्कि टेबल पर प्रमोशन का ऑर्डर चाहिए!"अब समय आ गया है कि सरकार इस विरोधाभासी रवैये को छोड़े। एक तरफ अदालतों को समय पर फैसले देने की दुहाई देना और दूसरी तरफ खुद अदालती फैसलों के खिलाफ अपीलों की कतार लगा देना—यह दोहरा मापदंड अब बेनकाब हो चुका है। कर्मचारियों का सब्र अब टूट चुका है; उन्हें दिखावे की राजनीति नहीं, उनका वाजिब हक चाहिए।

