मीडिया को संवैधानिक दर्जा: आवश्यकता, पक्ष-विपक्ष और वर्तमान स्थिति हरि शंकर पाराशर

मीडिया को संवैधानिक दर्जा: आवश्यकता, पक्ष-विपक्ष और वर्तमान स्थिति हरि शंकर पाराशर

मीडिया को संवैधानिक दर्जा: आवश्यकता, पक्ष-विपक्ष और वर्तमान स्थिति हरि शंकर पाराशर

मध्य प्रदेश समाचार न्यूज़ कटनी।भारतीय लोकतंत्र में मीडिया को 'चौथा स्तंभ' कहा जाता है, जो विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद जनता की आवाज और सत्ता की निगरानी की भूमिका निभाता है। लेकिन यह 'चौथा स्तंभ' संवैधानिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है। वर्तमान में मीडिया की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से व्युत्पन्न है, जो सभी नागरिकों को प्राप्त है। संविधान में 'प्रेस की स्वतंत्रता' का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों (जैसे सकल पेपर्स केस, 1962 और बेनेट कोलमैन केस) से स्थापित हुई है। अनुच्छेद 19(2) के तहत इस पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जैसे राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था या सदाचार के हित में।*

आज के दौर में मीडिया पर कॉरपोरेट नियंत्रण

राजनीतिक दबाव और सनसनीखेज पत्रकारिता की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण कई विचारक और पत्रकार मीडिया को संवैधानिक दर्जा देने की मांग करते हैं। इसका मतलब हो सकता है कि मीडिया को संविधान में स्पष्ट रूप से चौथा स्तंभ घोषित किया जाए, या एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था (जैसे चुनाव आयोग या CAG की तरह) बनाई जाए, जो मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा करे। वर्तमान में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) एक वैधानिक निकाय है, जो 1966 में प्रेस काउंसिल एक्ट के तहत गठित हुई। यह प्रिंट मीडिया की नैतिकता पर निगरानी रखती है, लेकिन इसका दर्जा संवैधानिक नहीं है—यह संसद द्वारा बनाया गया कानूनी निकाय है, जिसके फैसले अंतिम होते हैं लेकिन दंडात्मक शक्तियां सीमित हैं।* इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया के लिए अलग-अलग स्व-नियमन निकाय जैसे NBSA (न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी) हैं।

संवैधानिक दर्जा देने के पक्ष में तर्क

स्वतंत्रता की मजबूती: कॉरपोरेट घरानों और राजनीतिक दबाव से मीडिया को मुक्त किया जा सकेगा। आज बड़े उद्योगपति मीडिया हाउस चलाते हैं, जो अपने व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता देते हैं। संवैधानिक दर्जा मिलने से मीडिया सरकार या पूंजीपतियों के प्रभाव से ऊपर हो जाएगा, जैसे न्यायपालिका स्वतंत्र है।

जन-सरोकारों की रक्षा: मीडिया जनता की समस्याओं (महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य आदि) को प्रमुखता देगा, न कि सनसनी या TRP आधारित खबरें। इससे लोकतंत्र मजबूत होगा और सत्ता की जवाबदेही बढ़ेगी।

निष्पक्षता और निर्भीकता: एक संवैधानिक संस्था के तहत मीडिया को सुरक्षा मिलेगी, पत्रकारों पर हमले या मुकदमे कम होंगे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई लोकतंत्रों में प्रेस की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार माना जाता है।

वर्तमान कमियों का समाधान: PCI जैसी संस्थाएं कमजोर हैं—उनके पास इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर अधिकार नहीं, और दंड केवल चेतावनी तक सीमित। संवैधानिक दर्जा सभी मीडिया (प्रिंट, टीवी, डिजिटल) को एक छत के नीचे ला सकता है।

संवैधानिक दर्जा देने के विपक्ष में तर्क

अत्यधिक शक्ति का खतरा: मीडिया को संवैधानिक दर्जा देने से वह बहुत शक्तिशाली हो जाएगा, जो लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकता है। बिना जवाबदेही के मीडिया दुरुपयोग कर सकता है, जैसे फेक न्यूज या ट्रायल बाय मीडिया।

*मौजूदा प्रावधान पर्याप्त* अनुच्छेद 19(1)(a) पहले से ही प्रेस को पर्याप्त सुरक्षा देता है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे बार-बार मजबूत किया है। अतिरिक्त संवैधानिक दर्जा अनावश्यक होगा और संविधान संशोधन की जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।

स्व-नियमन बेहतर: मीडिया को सरकारी या संवैधानिक नियंत्रण से दूर रखना चाहिए, क्योंकि इससे सेंसरशिप का खतरा बढ़ेगा। वर्तमान स्व-नियमन निकाय (जैसे PCI, NBSA) को मजबूत करना बेहतर विकल्प है।

व्यावहारिक कठिनाइयां

डिजिटल युग में सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को नियंत्रित करना मुश्किल।संवैधानिक दर्जा देने से नए कानूनी विवाद बढ़ सकते हैं।

वर्तमान में (2025 तक) मीडिया को संवैधानिक दर्जा देने का कोई आधिकारिक प्रस्ताव या कानून नहीं है। कभी-कभी संसदीय समितियां या मीडिया संगठन इस पर चर्चा करते हैं, लेकिन यह मुख्य रूप से विचार स्तर पर है। प्रेस की स्वतंत्रता को मजबूत करने के लिए PCI को अधिक शक्तियां देना, डिजिटल मीडिया रेगुलेशन और पत्रकार सुरक्षा कानून जैसे कदम उठाए जा रहे हैं।

अंत में, मीडिया को संवैधानिक दर्जा मिले या न मिले, उसकी असली ताकत जनता के विश्वास और पत्रकारों की नैतिकता में है। यदि मीडिया जन-सरोकारों से जुड़ेगा और निष्पक्ष रहेगा, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपने आप मजबूत हो जाएगा। लेकिन कॉरपोरेट और राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने के दौर में इस पर गंभीर विचार की जरूरत है। आत्म-नियमन और कानूनी सुधारों से शुरुआत की जा सकती है, ताकि संवैधानिक संशोधन की जरूरत ही न पड़े।

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