सरकारी और निजी क्षेत्र में कर्मचारी सत्यापन प्रक्रियाओं की असमानता: श्रमिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा प्रशासनिक दोहरापन नई दिल्ली, 17 सितंबर 2025

 सरकारी और निजी क्षेत्र में कर्मचारी सत्यापन प्रक्रियाओं की असमानता: श्रमिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा प्रशासनिक दोहरापन नई दिल्ली, 17 सितंबर 2025

सरकारी और निजी क्षेत्र में कर्मचारी सत्यापन प्रक्रियाओं की असमानता: श्रमिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा प्रशासनिक दोहरापन नई दिल्ली, 17 सितंबर 2025

मध्य प्रदेश समाचार न्यूज़ कटनी।भारत के रोजगार बाजार में सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच सत्यापन प्रक्रियाओं की चरम असमानता ने आम श्रमिकों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। जहां रेलवे जैसी सरकारी नौकरियों में चयन के समय एक बार मेडिकल जांच और पूरे सेवा काल में केवल एक पुलिस वेरिफिकेशन पर्याप्त होता है, वहीं निजी क्षेत्र की कई कंपनियां कर्मचारियों से हर 3 महीने में पुलिस सत्यापन और सालाना मेडिकल टेस्ट के कागजात मांग रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दोहरा चरित्र न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है, बल्कि श्रमिकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ डाल रहा है, जिससे उनका दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है।रेलवे और अन्य सरकारी संस्थानों में चयन प्रक्रिया के दौरान मेडिकल परीक्षण अनिवार्य होता है, जो स्वास्थ्य की प्रारंभिक पुष्टि करता है। इसके बाद, पुलिस वेरिफिकेशन भी केवल एक बार किया जाता है, जो उम्मीदवार के चरित्र, अग्रणी इतिहास और नागरिकता की जांच करता है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश के अनुसार, यह वेरिफिकेशन नियुक्ति के 6 महीने के भीतर पूरा होना चाहिए। लेकिन निजी क्षेत्र, खासकर आईटी, बैंकिंग, हेल्थकेयर और सिक्योरिटी जैसे संवेदनशील उद्योगों में, कंपनियां अपनी नीतियों के तहत नियमित सत्यापन थोप रही हैं। उदाहरण के लिए, कुछ निजी फर्में गिग इकोनॉमी वर्कर्स या कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों से तिमाही पुलिस वेरिफिकेशन और वार्षिक मेडिकल सर्टिफिकेट की मांग करती हैं, जो सरकारी मानकों से कहीं अधिक कठोर है।

इस असमानता का कारण क्या है? विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी नौकरियां सार्वजनिक विश्वास और सुरक्षा पर आधारित होती हैं, इसलिए एकबारगी सत्यापन पर्याप्त माना जाता है। वहीं, निजी कंपनियां जोखिम प्रबंधन और ब्रांड सुरक्षा के नाम पर अतिरिक्त जांच करती हैं, लेकिन यह अक्सर कंपनी-विशिष्ट नीतियों पर निर्भर करता है, न कि किसी राष्ट्रीय मानक पर। ऑथब्रिज की 2024 वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, निजी क्षेत्र में बैकग्राउंड वेरिफिकेशन में 44% वृद्धि हुई है, जो गिग इकोनॉमी और ई-कॉमर्स में 12.5% असंगतियां दर्शाती है। हालांकि, कोई स्पष्ट कानूनी बाध्यता नहीं है, लेकिन कुछ राज्य जैसे महाराष्ट्र और असम में निजी रोजगार के लिए चरित्र सत्यापन अनिवार्य है।इस दोहरे मापदंड का सबसे बड़ा शिकार आम श्रमिक हैं। एक औसत निजी कर्मचारी को पुलिस वेरिफिकेशन के लिए स्थानीय थाने जाना पड़ता है, जहां फीस, यात्रा और समय की बर्बादी होती है। मेडिकल टेस्ट की लागत 500 से 2000 रुपये तक हो सकती है, जो सालाना दोहराने पर हजारों रुपये का बोझ बन जाता है। विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के 90% से अधिक श्रमिक, जो जीडीपी का आधा हिस्सा योगदान देते हैं, इस बोझ से जूझ रहे हैं। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2022-23 के अनुसार, 74% गैर-कृषि श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं, जहां नौकरी की अनिश्चितता पहले से ही अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रक्रिया न केवल आर्थिक रूप से थकाऊ है, बल्कि कर्मचारियों को बार-बार छुट्टी लेने या दैनिक काम प्रभावित होने के कारण तनावग्रस्त कर देती है।राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को हल करने की मांग तेज हो रही है। लेबर इकोनॉमिस्ट्स का सुझाव है कि एक समान राष्ट्रीय नीति बनाई जाए, जिसमें सत्यापन प्रक्रियाओं को डिजिटल और एकीकृत किया जाए, ताकि दोहराव समाप्त हो। यदि जीएसटी की तरह एक यूनिफाइड वेरिफिकेशन सिस्टम लागू हो, तो श्रमिकों का बोझ कम होगा और उत्पादकता बढ़ेगी। फिलहाल, यह असमानता भारत की 'आत्मनिर्भर' अर्थव्यवस्था के सपने को कमजोर कर रही है, जहां श्रमिकों की मेहनत ही आधार है। सरकार को अब इस दिशा में कदम उठाने की जरूरत है, वरना असंगठित क्षेत्र का संकट और गहरा सकता है।

सरकारी और निजी क्षेत्र में कर्मचारी सत्यापन प्रक्रियाओं की असमानता: श्रमिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहा प्रशासनिक दोहरापन नई दिल्ली, 17 सितंबर 2025


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