छपे शब्दों की अनंत शक्ति स्वतंत्र लेखन,हरीशंकर पाराशर

 छपे शब्दों की अनंत शक्ति स्वतंत्र लेखन,हरीशंकर पाराशर

छपे शब्दों की अनंत शक्ति स्वतंत्र लेखन,हरीशंकर पाराशर

मध्य प्रदेश समाचार न्यूज़ कटनी।अखबार सिर्फ कागज का एक टुकड़ा नहीं होता। वह हर सुबह दरवाजे पर दस्तक देता है और चुपके से कहता है—दुनिया अभी भी जीवित है, चल रही है, बदल रही है। एक पल में आप दिल्ली की गलियों से गाजा की सड़कों पर पहुँच जाते हैं, फिर वॉल स्ट्रीट की हलचल के बीच और अगले ही पन्ने पर हिमालय की किसी गुमनाम वादी में खो जाते हैं। यह चमत्कार कोई जादू नहीं, छपे हुए शब्दों की शक्ति है।आज डिजिटल युग में जब हर खबर एक क्लिक दूर है, तब भी अखबार का अपना अलग ठहराव है। स्क्रीन की नीली रोशनी में उंगलियाँ थक जाती हैं, पर कागज पर स्याही की हल्की-सी खुशबू और अंगुलियों के नीचे कागज का स्पर्श एक अनोखा सुकून देता है। यह सुकून सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक भी है। अखबार पढ़ते वक्त हम खबर को निगलते नहीं, चबाते हैं। सोचते हैं। बहस करते हैं। कभी कॉफी का दाग लग जाता है पन्ने पर, कभी कलम से किनारे पर अपनी राय लिख देते हैं। अखबार मूक नहीं रहता—वह हमारे साथ बात करता है।छपे हुए शब्दों में एक अनुशासन होता है। ट्विटर पर 280 अक्षरों में दुनिया को समझा देने की जल्दबाजी नहीं होती यहाँ। यहाँ संपादक की नजर, फैक्ट-चेक की सख्ती और भाषा की गरिमा होती है। एक गलत खबर छप जाए तो अगले दिन सुधार छपता है, माफी माँगी जाती है। यह जवाबदेही डिजिटल माध्यमों में दुर्लभ होती जा रही है, जहाँ गलती फैलती तो वायरल स्पीड से है, पर सुधार आता है कछुआ चाल से—अगर आता भी है तो।अखबार सिर्फ खबर नहीं लाता, वह इतिहास भी लिखता है। आज का पहला पन्ना कल का दस्तावेज बन जाता है। दशकों बाद जब कोई शोधकर्ता 2025 के भारत को समझना चाहेगा, तब वही पीले पड़ चुके पन्ने उसकी सबसे विश्वसनीय गवाही होंगे। ट्विटर थ्रेड्स मिट जाएँगे, वेबसाइट्स बंद हो जाएँगी, पर अखबार की फाइलें लाइब्रेरी की अलमारियों में साँस लेती रहेंगी।सबसे खूबसूरत बात—अखबार में हर दिन नया करने की गुंजाइश रहती है। एक ही घटना को दस अलग-अलग लेखक दस अलग नजरियों से लिख सकते हैं। कोई आँकड़ों में उलझाएगा, कोई मानवीय कहानियों में। कोई सत्ता से सवाल करेगा, कोई विपक्ष को घेरेगा। यही विविधता अखबार को जीवंत रखती है। यह लोकतंत्र का चौथा खंभा तभी मजबूत रहता है, जब उसमें हर रंग को जगह मिले।हाँ, चुनौतियाँ हैं। विज्ञापनों की कमी, युवा पाठकों का मोबाइल की ओर पलायन, फेक न्यूज का दबाव—ये सब हैं। पर हर सुबह जब हॉकर साइकिल की घंटी बजाता है और अखबार दरवाजे पर गिरता है, तब लगता है—ये संस्था अभी मरेगी नहीं। क्योंकि यह सिर्फ व्यापार नहीं, एक विश्वास है। विश्वास इस बात का कि कल सुबह भी कोई आएगा और कहेगा—दुनिया अभी रुकी नहीं है, चलो फिर से शुरू करते हैं।छपे हुए शब्दों की शक्ति अपार है। और जब तक इंसान सोचता रहेगा, पढ़ता रहेगा, सवाल उठाता रहेगा—तब तक यह शक्ति जीवित रहेगी।

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